शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

class 12 rajnitik vigyan political scienceइकाई 1 लेसन 3 लेसन 3

महत्वपूर्ण बिन्दु

धर्म मनुष्य में पहले से व्याप्त देवत्व व आध्यात्मिकता का विस्तार मात्र हैं।

विश्व की अधिकांश राजनीतिक व्यवस्थाओं में धर्मनिरपेक्षता को नीति के रूप में स्वीकार करने पर बल दिया जाता है।

विश्व के विभिन्न भागों में काल, स्थान व संस्कृति के अनुरूप कई धर्मों का उद्भव व विकास हुआ। • समय, स्थान और सांस्कृतिक व आध्यात्मिक परिस्थितियों के परिवर्तन से धर्मों में भी परिवर्तन आये।

सभी धर्मों ने मूलतः एकता के बुनियादी तथ्यों एवं मूल्यों

की बात की है। वर्तमान समस्या अलग-अलग धर्मों और मतों में एकता स्थापित करने की चेष्टा की हैं।

धर्म आत्मा के उन्नयन के लिए आध्यात्मिक पक्ष पर बल देता है। ० धर्म, जीवन को धर्म निरपेक्षता की ओर अग्रेषित करें। भारतीय संस्कृति और दर्शन में धर्म सदैव एक महत्त्वपूर्ण

संकल्पना रही हैं।

धर्म का सबसे पहले आगाज पूर्वी संस्कृतियों में हुआ। . भारत में धर्म को कर्त्तव्य, अहिंसा, न्याय सदाचरण

तथा सद्गुण के अर्थ में मान्यता प्राप्त हैं। ० धर्म उन्नति और कल्याण में साधक होता है।

अंग्रेजी में धर्म का समानान्तर शब्द Religion (रिलिजन) है, जिसका अर्थ है - आस्था, विश्वास अथवा अपनी मान्यता।

धर्म सर्वत्र पवित्र माना गया है, लेकिन धार्मिक पवित्रता सापेक्षवादी है।

धार्मिक मतों व पंथों ने अपनी व्यक्तिगत श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए एक-दूसरे से लड़ना-भिड़ना शुरु कर दिया है। इस तरह की आपसी विरोध,कलह की प्रवृत्ति ने धार्मिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज के परिप्रेक्ष्य में मानवता के धर्म को सबसे श्रेष्ठ

धर्म समझा जाये। एक धर्म तभी उपयोगी है जब वह अन्य सादृश धर्मों से एकरूपता स्थापित करता ।

सभी धर्मों के समान मूल्यों से ही विश्व में ईश्वरीय राज्य

की स्थापना सम्भव है।

जब-जब धर्म व राजनीति का नकारात्मक संसर्ग हुआ हैं, तब-तब राजनीति ने धर्म का दुरूपयोग किया हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्म निरपेक्षता का अर्थ पाश्चात्य

धर्म से भिन्न है। भारतीय संकल्पना में धर्म केवल लौकिक धर्म नहीं हैं। • धर्म और अहिंसा का अटूट सम्बन्ध हैं।

• भारत में धर्म का संबंध साधनापक्ष एवं आचारपक्ष से हैं जिसका लक्ष्य आत्मा का उत्थान हैं।

० याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ लक्षण गिनाये है। राष्ट्र धर्म सर्वोपरि है ण

• ईसाई धर्म एकेश्वरवादी धर्म है

ईसाई राजनीतिक विचारधारा में धर्म और राजनीति दोनों की समानान्तर सत्ता को स्वीकार किया गया है।

• इस्लाम दुनिया के नवीनतम धर्मों में से एक है।

• इस्लाम धर्म के आध्यात्मिक और लौकिक, अलौकिक और व्यावहारिक, धार्मिक और धर्म निरपेक्ष में भेद नहीं करता

इस्लाम धर्म और राजनीति के मध्य कोई भेद नहीं करता बल्कि दोनों को एक दूसरे से गुंथा हुआ मानता हैं।

34 धर्म और राजनीति (Religion & Politics)

34 धर्म और राजनीति (Religion & Politics) प्राचीन समय से "धर्म और राजनीति" अथवा "राजनीति

और धर्म" में गहरा संबंध रहा हैं। जब-जब धर्म व राजनीति का नकारात्मक संसर्ग हुआ हैं, तब-तब राजनीति ने धर्म का दुरूपयोग किया हैं। बट्ट्रेड रसेल और ई. एम. फोस्टर जैसे शान्तिवादी विद्वानों ने धर्म की इस बात के लिए आलोचना की है कि धर्म के नाम पर शुद्ध राजनीति करने से विश्व में हमेशा खून-खराबा हुआ है जो आज भी जारी है। आज भी सभी धर्मों में धर्मान्ध कट्टरपंथी मरने मारने को तैयार है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व में कई ऐसे शक्ति समूह व संवर्ग उत्पन्न हुए है। प्रारम्भ में धर्म, शासन के लिए सुव्यवस्था और सुनीति का संस्थापक बना लेकिन बाद में अनेक शासकों ने धर्म विशेष को अपना राजधर्म घोषित किया और अपने अनुयायिओं की संख्या बढ़ाने के लिए धर्म की आड़ में युद्ध किए। इस्लाम, इसाई, यहुदी और हिन्दु धर्म से पृथक् हुए कुछ मतों ने शक्ति की आड़ में अपनी मान्यता, अपने धर्म के विस्तार का कार्य किया। धर्म की आड़ में साम्राज्यों का विस्तार किया गया और अनेक देशों में परस्पर युद्ध हुए। विगत लगभग दो हजार वर्ष का इतिहास धर्म के नाम पर अनेक बार रक्त रंजित हुआ। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में धर्म आधारित युद्धों पर कुछ हद तक विराम अवश्य लगा किन्तु धार्मिक श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए धर्म की आड़ मेंआतंकी गतिविधियों की बाढ़ आ गई है। आतंकवादियों ने दूसरे धर्मानुयायियों को अकारण शिकार बनाना आरम्भ कर दिया है। भारत इसका सबसे बड़ा शिकार है।

राम मनोहर लोहिया के अनुसार "धर्म और राजनीति के दायरे अलग-अलग हैं परन्तु दोनों की जड़े एक हैं। धर्म दीर्घकालीन राजनीति हैं, जबकि राजनीति अल्पकालीन धर्म हैं। धर्म का काम भलाई करना और उसकी स्तुति करना हैं, जबकि राजनीति का कार्य बुराई से लड़ना और बुराई की निन्दा करना हैं। समस्या तब उत्पन्न होती हैं जब राजनीति बुराई से लड़ने के स्थान पर केवल निन्दा करती हैं, तो वह कलही हो जाती हैं, इसलिये आवश्यक हैं कि धर्म और राजनीति के मूल तत्वों को समझा जाये । धर्म और राजनीति का विवेकपूर्ण मिलन मानवीय कल्याण में साधक होता हैं, जबकि इन दोनों का अविवेकपूर्ण मिलन दोनों को भ्रष्ट कर देता हैं, जो मानवता के लिए अनिष्टकारी होता हैं। इस अविवेकपूर्ण मिलन से साम्प्रदायिक कट्टरता उत्पन्न होती हैं। धर्म और राजनीति को पृथक् करने का सबसे बड़ा उद्देश्य यही हैं कि दोनों अपने-अपने मर्यादित क्षेत्र में सक्रिय रहें किन्तु दोनों एक दूसरे का अपनी निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये दुरूपयोग न करें। वस्तुतः धर्म और राजनीति में सदैव मर्यादित सम्पर्क बना रहना चाहिए ताकि दोनों एक दूसरे का परस्पर सकारात्मक सहयोग कर सकें। नीतिगत धर्म व धर्मप्रद राजनीति का अनुगमन विश्व शान्ति की स्थापना के लिये अपरिहार्य है। राजनीति का धर्म को और धर्म का राजनीति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करना मानवता के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है। इससे धार्मिक प्रतिक्रियावाद, कट्टरपन, साम्प्रदायिकता व गुलामी की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, जो स्वतन्त्रता व समानता जैसे महत्त्वपूर्ण मूल्यों को प्रभावित करती है। आज विश्व में अधिकांश लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार "आडम्बर आच्छादित व हठधर्मितापूर्ण धर्म मनुष्य को विभाजित करता है, जबकि अनुभव से विकसित धर्म मनुष्य को परस्पर जोड़ने का कार्य करता है।" उन्होंने यह भी कहा है कि "जो दूसरों के लिये जीते हैं, वे ही सच में जीते हैं, शेष तो जीते हुए भी मरे जैसे है।" उनके अनुसार व्यक्ति और समाज में परस्पर अनुकूलता एकात्मकता का भाव व मानवतावादी दृष्टिकोण धर्म के अनुशीलन से ही संभव है।

कक्षा 12वीं की राजनीतिक विज्ञान इकाई 1 प्रमुख अवधारणाएं पाठ 1 न्याय जस्टिस महत्वपूर्ण बिंदु

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में धर्म' का प्रयोग न्याय' के सादृश हुआ है।

प्लेटो ने न्याय को मनुष्य का आत्मीय गुण माना है। प्लेटो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना ही न्याय है।

अरस्तू के अनुसार न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। परम्परागत न्याय का सरोकार व्यक्ति के चरित्र से है,

वहीं आधुनिक दृष्टिकोण का सरोकार सामाजिक न्याय

से है।

प्लेटो और अरस्तू परम्परागत न्याय के प्रमुख विचारक हैं।

. प्लेटो ने न्याय सिद्धान्त की व्याख्या अपनी रचना रिपब्लिक' में की हैं।

प्लेटो न्याय के दो रूप मानता है - 1.व्यक्तिगत न्याय

2.सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय

अरस्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किए - 1.वितरणात्मक

. 2.सुधारात्मक न्याय मध्यकाल में संत ऑगस्टाइन ने ईश्वरीय राज्य में न्याय को अपरिहार्य तत्व माना है।

. थॉमस एक्विनास समानता को न्याय का मौलिक तत्व मानते हैं।

जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सम्बन्धी विचार अपनी पुस्तक 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस (ATheory of Justice) में व्यक्त किए है।

जॉन रॉल्स ने अज्ञानता के पर्दे (Veil of Ignorance) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। न्याय की धारणा के विविध रूप

1.नैतिक न्याय 2.कानूनी न्याय

3.राजनीतिक न्याय

4.सामाजिक न्याय

5.आर्थिक न्याय

डेविड ह्यूम ने नियमों की अनुपालना को ही न्याय माना

है।

जेरेमी बेंथम ने अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को ही न्याय का मूल मंत्र माना है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता

का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व माना है।

1.4 आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा ( The Concept of Justice in Modern Period)

1.4 आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा ( The Concept of Justice in Modern Period)

आधुनिक युग में डेविड ह्यूम (1711-76) ने यह मत व्यक्त किया कि न्याय का अर्थ नियमों की पालना मात्र है क्योंकि अनुभव से यह सिद्ध हो चुका है कि ये नियम सर्व- हित' का आधार है। अतः ' सर्व- हित ' या 'सार्वजनिक उपयोगिता को न्याय का एकमात्र स्त्रोत होना चाहिए। मनुष्य की प्रकृति, तर्कबुद्धि या अनुबन्ध में इन नियमों का स्त्रोत ढूंढ़ने से कोई लाभ नहीं फिर उपयोगितावाद के प्रवर्तक जैरेमी बेंथम ने कहा कि प्राकृतिक कानून' सरीखी शब्दावली यथार्थ मूल्यों को धुंधला कर देती है। सार्वजनिक वस्तुओं, सेवाओं, इत्यादि का वितरण उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए जिसका सूत्र अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व मानते हुए यह तर्क दिया है कि मनुष्य अपने लिए सुरक्षा की कामना करते हैं, इसलिए वे ऐसे नैतिक नियम स्वीकार कर लेते हैं जिनमें दूसरे भी वैसी ही सुरक्षा अनुभव कर सकें। अतः उपयोगिता ही न्याय का मूल मन्त्र है।

वर्तमान में प्राकृतिक कानून या कोरी उपयोगिता पर आधारित न्याय की संकल्पना में विश्वास नहीं किया जाता। वस्तुतः प्राकृतिक कानून के नियमों, प्राकृतिक अधिकारों या सार्वजनिक उपयोगिता के स्वरूप के बारे में कोई सर्वसम्मत मान्यता विकसित नहीं हो पाई है। आज न्याय के सम्बन्ध में केवल ऐसी संकल्पना को स्वीकार कर सकते हैं जिसका निर्माण जीवन के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक यथार्थ को सामने रखकर किया गया हो।

1.3 मध्यकाल में न्याय सम्बन्धी विचार (The Concept of Justice in Medieval Period)संत ऑगस्टाइन

संत ऑगस्टाइन अपने 'ईश्वरीय राज्य ' के सिद्धान्त को प्रतिपादित करने में न्याय को इसका महत्त्वपूर्ण व अपरिहार्य तत्व माना है। वह अपनी रचना " द सिटी ऑफ गॉड " में लिखते हैं कि " जिन राज्यों में न्याय विद्यमान नहीं हैं, वे केवल चोर उच्चक्कों की खरीद फरोख्त हैं।

"Set justice aside them and what are kìngdoms but fair thievish purchases."

ऑगस्टाइन परिवार, लौकिक राज्य और ईश्वरीय राज्य के सन्दर्भ में न्याय की विवेचना करते हैं। व्यक्ति द्वारा ईश्वरीय राज्य के प्रति कर्त्तव्य पालन को ही वह न्याय मानते हैं।

मध्यकाल में ही थॉमस एक्विनास कानून व न्याय को परस्पर सम्बन्धित मानते हुए न्याय की निम्नलिखित परिभाषाव्यक्त करते हैं

"न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन व्यतीत करने तथा उन कर्त्तव्यों का पालन करने में निहित हैं, जिनकी व्यवस्था मांग करती है।"

थॉमस एक्विनास समानता को न्याय का मौलिक तत्व

मानते हैं।

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के अनुसार, न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे मे एक -जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है। इस मानकीय धारणा के रूप में न्याय समग्र सात्विकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयोग-क्षेत्र के आधार पर अस्स्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किये -1.वितरणात्मक न्याय(Distributive Justice)-अस्स्तु वितरणात्मक न्याय के अन्तर्गत शक्ति एवं संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता व योगदान के अनुरूप करने की बात कहता है। वह आनुपातिक समानता का पक्षधर है। समानता की इस अवधारणा के अनुसार लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के अनुपात में ही होना चाहिए।सुधारात्मक न्याय (Corrective Justice) -अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम पर बल देता हो। सुधारात्मक न्याय में राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता की रक्षा करें। इस प्रकार वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य द्वारा की गयी व्यवस्था को सुधारात्मक न्याय की संज्ञा देता है।

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के अनुसार, न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे मे एक -जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है। इस मानकीय धारणा के रूप में न्याय समग्र सात्विकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयोग-क्षेत्र के आधार पर अस्स्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किये -











     



1.

वितरणात्मक न्याय

(Distributive Justice)-

अस्स्तु वितरणात्मक न्याय के अन्तर्गत शक्ति एवं संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता व योगदान के अनुरूप करने की बात कहता है। वह आनुपातिक समानता का पक्षधर है। समानता की इस अवधारणा के अनुसार लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के अनुपात में ही होना चाहिए।






सुधारात्मक न्याय (Corrective Justice) -



अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम पर बल देता हो। सुधारात्मक न्याय में राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता की रक्षा करें। इस प्रकार वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य द्वारा की गयी व्यवस्था को सुधारात्मक न्याय की संज्ञा देता है।





















समाप्त


1.1 प्लेटो का न्याय सम्बन्धी विचार (Plato's Concept of Justice)

प्लेटो का न्याय से तात्पर्य है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना। प्लेटो ने न्याय को एक मौलिक सदगुण (Cardinal) मानते कहा है कि हम सभी अपेक्षित हितों को साधने में सहायक बनें। प्लेटो अपनी पुस्तक रिपब्लिक में न्याय को समझाने के लिए पुस्तक II, III और IV में काफी रोचक विश्लेषण करता है। वह सबसे पहले सामाजिक व राजनीतिक न्याय की धारणा को व्यक्तिगत न्याय से पृथक करने की चेष्टा करता है।




प्लेटो न्याय के दो रूप मानता है जिनमें एक व्यक्तिगत और दूसरा सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय प्लेटो की मान्यता थी कि मानवीय आत्मा में तीन तत्व पाये जाते हैं - बुद्धि, शौर्य और तृष्णा। इन तीनों तत्वों की मात्रा के अनुसार ही वह राज्य और समाज में तीन वर्ग स्थापित करता है। पहला शासक वर्ग, जिसमें बुद्धि का अंश सर्वाधिक पाया जाता है। दूसरा सैनिक वर्ग या रक्षक वर्ग जिसमें शौर्य एवं साहस तत्व की अपेक्षाकृत अधिक मात्रा पायी जाती है। तीसरा उत्पादक या सहायक वर्ग जिसमें इन्द्रिय तृष्णा व इच्छा तत्व की अधिकता पायी जाती है। सभी मनुष्यों में तीनों त्व न्यूनाधिक मात्रा में पाये जाते हैं। परन्तु जिस तत्व की मात्रा प्रधान रूप से पायी जाती है, वही उसके सद्गुणों को प्रवृत करता है। प्लेटो न्याय को आत्मा का मानवीय सद्गुण मानता है। प्लेटो के अनुसार आत्मा में निहित न्याय का विचार वास्तव में राज्य में निहित न्याय का ही सादृश्य है। जिस प्रकार व्यक्ति की आत्मा में विद्यमान न्याय व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को परस्पर संतुलित करता है, उसी भाँति राज्य में व्याप्त न्याय, समाज के तीनों वर्गों में सामंजस्य स्थापित करता है। प्रत्येक व्यक्ति को वही कार्य करना चाहिए जिसके लिए वह प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक समर्थ व उपयुक्त है। इसी तरह राज्य के तीनों वर्गों को भी अपने-अपने निर्दिष्ट कार्यक्षेत्र की परिधि में ही कार्य करना चाहिए। दूसरों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप को प्लेटो व्यक्ति व राज्य दोनों के लिए अनिष्टकारी मानता है। इन तत्वों की उपस्थिति के अनुपात में ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता व क्षमता के अनुरूप आचरण करना चाहिए और दूसरों के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस प्रवृत्ति को प्लेटो न्याय की संज्ञा देता है। प्लेटो ने अपने न्याय के सिद्धान्त को एक नैतिक सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किया न कि कानूनी सिद्धान्त के रूप में। उनका न्याय सिद्धान्त कार्य विशेषीकरण के सिद्धान्त पर आधारित है जो प्रत्येक व्यक्ति को समाज के प्रति विशेष योगदान हेतु प्रेरित करता है।








नीरज चोपड़ा ने गर्लफ्रेंड और शादी के सवाल पर दिया ये जवाब

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