शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के अनुसार, न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे मे एक -जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है। इस मानकीय धारणा के रूप में न्याय समग्र सात्विकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयोग-क्षेत्र के आधार पर अस्स्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किये -1.वितरणात्मक न्याय(Distributive Justice)-अस्स्तु वितरणात्मक न्याय के अन्तर्गत शक्ति एवं संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता व योगदान के अनुरूप करने की बात कहता है। वह आनुपातिक समानता का पक्षधर है। समानता की इस अवधारणा के अनुसार लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के अनुपात में ही होना चाहिए।सुधारात्मक न्याय (Corrective Justice) -अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम पर बल देता हो। सुधारात्मक न्याय में राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता की रक्षा करें। इस प्रकार वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य द्वारा की गयी व्यवस्था को सुधारात्मक न्याय की संज्ञा देता है।

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के अनुसार, न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे मे एक -जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है। इस मानकीय धारणा के रूप में न्याय समग्र सात्विकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयोग-क्षेत्र के आधार पर अस्स्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किये -











     



1.

वितरणात्मक न्याय

(Distributive Justice)-

अस्स्तु वितरणात्मक न्याय के अन्तर्गत शक्ति एवं संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता व योगदान के अनुरूप करने की बात कहता है। वह आनुपातिक समानता का पक्षधर है। समानता की इस अवधारणा के अनुसार लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के अनुपात में ही होना चाहिए।






सुधारात्मक न्याय (Corrective Justice) -



अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम पर बल देता हो। सुधारात्मक न्याय में राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता की रक्षा करें। इस प्रकार वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य द्वारा की गयी व्यवस्था को सुधारात्मक न्याय की संज्ञा देता है।





















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