शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

न्याय की अवधारणा (Concept of Justice)

 न्याय की अवधारणा (Concept of Justice)


न्याय की संकल्पना प्राचीन काल से ही राजनीतिक चिंतन का महत्त्वपूर्ण विषय रही है। पश्चिमी परम्परा के अन्तर्गत न्याय के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए मुख्यतः न्यायपरायण व्यक्ति ' अर्थात् सद्चरित्र मनुष्य के गुणों पर विचार किया जाता था। इसमें उन सद्गुणों की तलाश की जाती थी जो व्यक्ति को न्याय की ओर प्रवृत्त करते हैं। भारतीय परम्परा में भी मनुष्य के 'धर्म ' को प्रमुखता दी गई है। इन दोनों ही मान्यताओं में मनुष्य के कर्तव्य पालन पर बल दिया गया है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना एवं दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है। यद्यपि आधुनिक चिंतन में न्याय की परिभाषा में परिवर्तन आया है।


न्याय प्रत्यय ' की व्याख्या अलग-अलग विचारकों ने अपने-अपने ढंग से करने का प्रयत्न किया है। पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय के अर्थ को स्पष्ट करने का सर्वप्रथम प्रयास यूनानी दार्शनिक एवं राजनीतिक विचारक प्लेटो ने किया था। प्लेटो ने अपने दर्शन में ' न्याय प्रत्यय को मनुष्य का आत्मीय गुण माना है। उनके अनुसार यह वह सदगुण है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य सबकी भलाई में अपना भला ढूंढता है। प्लेटो से लेकर अब तक सभी चिंतकों ने न्याय को महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं नैतिक प्रत्यय माना है। एक तरफ न्याय, व्यक्ति का निजी चारित्रिक सद्गुण है. वहीं दूसरी तरफ न्याय राजनीतिक समाज का वांछनीय गुण माना गया है। न्याय, नैतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक निर्णयन को प्रभावित करने वाला तत्व है। मध्यकालीन ईसाई विचारकों ऑगस्टाइन व एक्वीनास ने न्याय की अपने ढंग से व्याख्या की है। आधुनिक चिंतन के प्रारम्भिक चरण में हॉब्स, ह्यूम, कार्ल मार्क्स, काण्ट और मिल ने अपने चिंतन में न्याय को प्रमुख स्थान प्रदान किया है। समकालीन विचारकों में जॉन रॉल्स ने न्याय को नवीन स्वरूप में प्रस्तुत किया है।

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