प्लेटो ने न्याय को मनुष्य का आत्मीय गुण माना है। प्लेटो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना ही न्याय है।
अरस्तू के अनुसार न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। परम्परागत न्याय का सरोकार व्यक्ति के चरित्र से है,
वहीं आधुनिक दृष्टिकोण का सरोकार सामाजिक न्याय
से है।
प्लेटो और अरस्तू परम्परागत न्याय के प्रमुख विचारक हैं।
. प्लेटो ने न्याय सिद्धान्त की व्याख्या अपनी रचना रिपब्लिक' में की हैं।
प्लेटो न्याय के दो रूप मानता है - 1.व्यक्तिगत न्याय
2.सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय
अरस्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किए - 1.वितरणात्मक
. 2.सुधारात्मक न्याय मध्यकाल में संत ऑगस्टाइन ने ईश्वरीय राज्य में न्याय को अपरिहार्य तत्व माना है।
. थॉमस एक्विनास समानता को न्याय का मौलिक तत्व मानते हैं।
जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सम्बन्धी विचार अपनी पुस्तक 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस (ATheory of Justice) में व्यक्त किए है।
जॉन रॉल्स ने अज्ञानता के पर्दे (Veil of Ignorance) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। न्याय की धारणा के विविध रूप
1.नैतिक न्याय 2.कानूनी न्याय
3.राजनीतिक न्याय
4.सामाजिक न्याय
5.आर्थिक न्याय
डेविड ह्यूम ने नियमों की अनुपालना को ही न्याय माना
है।
जेरेमी बेंथम ने अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को ही न्याय का मूल मंत्र माना है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता
का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व माना है।
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