शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

1.4 आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा ( The Concept of Justice in Modern Period)

1.4 आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा ( The Concept of Justice in Modern Period)

आधुनिक युग में डेविड ह्यूम (1711-76) ने यह मत व्यक्त किया कि न्याय का अर्थ नियमों की पालना मात्र है क्योंकि अनुभव से यह सिद्ध हो चुका है कि ये नियम सर्व- हित' का आधार है। अतः ' सर्व- हित ' या 'सार्वजनिक उपयोगिता को न्याय का एकमात्र स्त्रोत होना चाहिए। मनुष्य की प्रकृति, तर्कबुद्धि या अनुबन्ध में इन नियमों का स्त्रोत ढूंढ़ने से कोई लाभ नहीं फिर उपयोगितावाद के प्रवर्तक जैरेमी बेंथम ने कहा कि प्राकृतिक कानून' सरीखी शब्दावली यथार्थ मूल्यों को धुंधला कर देती है। सार्वजनिक वस्तुओं, सेवाओं, इत्यादि का वितरण उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए जिसका सूत्र अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व मानते हुए यह तर्क दिया है कि मनुष्य अपने लिए सुरक्षा की कामना करते हैं, इसलिए वे ऐसे नैतिक नियम स्वीकार कर लेते हैं जिनमें दूसरे भी वैसी ही सुरक्षा अनुभव कर सकें। अतः उपयोगिता ही न्याय का मूल मन्त्र है।

वर्तमान में प्राकृतिक कानून या कोरी उपयोगिता पर आधारित न्याय की संकल्पना में विश्वास नहीं किया जाता। वस्तुतः प्राकृतिक कानून के नियमों, प्राकृतिक अधिकारों या सार्वजनिक उपयोगिता के स्वरूप के बारे में कोई सर्वसम्मत मान्यता विकसित नहीं हो पाई है। आज न्याय के सम्बन्ध में केवल ऐसी संकल्पना को स्वीकार कर सकते हैं जिसका निर्माण जीवन के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक यथार्थ को सामने रखकर किया गया हो।

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