रविवार, 24 जनवरी 2021

उसने कहा था जबरदस्त कहानी रोमांटिक कहानी

लेखक-परिचय पं. चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' (1883 ई.-1922 ई.) हिन्दी कहानी के उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म जयपुर में हुआ। वे बचपन से ही साहित्यिक प्रतिभा संपन्न थे इनकी प्रतिभा का क्षेत्र खगोल, विज्ञान, ज्योतिष, धर्म, भाषा-विज्ञान, इतिहास, शोध एवं साहित्य तक विस्तृत था। उसने कहा था हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी है, जिसका प्रकाशन 1915 ई. में हुआ था। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'सुखमय जीवन' और 'बुद्धू का काँटा आदि कहानियाँ भी लिखीं। 'कछुआ धर्म', 'मारेसि मोहि कुठांव' आदि उनकी निबंध कला के प्रतिमान हैं। उन्होंने मासिक पत्र 'समालोचक का संपादन किया एवं वे नागरी प्रचारिणी सभा काशी के संपादक मंडल में भी रहे। 39 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया। पाठ-परिचय उसने कहा था प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918ई) की पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक मार्मिक कहानी है, जिसका कथानक प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा को केन्द्र में रखकर बुना गया है। अमृतसर के बाजार का दृश्य, बालक-बालिका का बालसुलभ निश्छल प्रेम, महायुद्ध का वातावरण और लहनासिंह के आत्मोत्सर्ग आदि के वर्णन में गहरा मनोवैज्ञानिक पुट है। यह कहानी प्रारंभिक चहल-पहल से लेकर प्रेम और कर्तव्य का विकट पथ पार करती हुई मृत्यु-शैया पर समाप्त होती है। यह उत्सर्ग प्रेम-वेदना जनित नहीं, बल्कि कर्त्तव्य की प्रसन्नता है। आंचलिक शब्दों के साथ यथार्थ वर्णन व उत्कट भाव-व्यंजना से यह कहानी हिन्दी साहित्य की विशिष्ट धरोहर है। बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ीवालों की ज़बान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए.... कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरे को चींथकर अपने- ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध में चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्डी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर, चलो खालसा जी! हटो भाई जी! ठहरना भाई जी आने दो लाला जी! हटो बा'छा!... कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बतखों, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती ही नहीं, चलती है. पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं हट जा जीणे जोगिए; हट जा, करमाँवालिए; हट जा पुत्तों प्यारिए: बच जा लम्बी उमरौं वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यशाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियों के नीचे आना चाहती है?बच जा। ऐसे बम्बूकार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था. और यह रसोई के लिए बड़ियोँ दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था। तेरे घर कहाँ है? मगरे में, और तेरे? माँझे में, यहाँ कहाँ रहती है? 'अतरसिंह की बैठक में, वे मेरे मामा होते हैं। मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार में हैं। इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुस्कराकर पूछा- 'तेरी कुड़माई हो गई?' इस पर लड़की कुछ आँख चढ़ा कर धत् कह कर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया। दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ या दूधवाले के यहाँ, अकस्मात् दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा- तेरी कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही घत मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली- हाँ, हो गई। कब? कल; देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू। भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते के पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्चे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा। राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खन्दकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गई। लुधियाने से दस गुना जाड़ा और मेह और बर्फ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धैंसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं - घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाडने वाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती है और सौ-सौ गज घरती उछल पड़ती है। इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का जलजला सुना था, यहाँ दिन में पच्चीस जलजले होते हैं। जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं। लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खन्दक में बिता ही दिए। परसों रिलीफ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे उसी फिरंगी मेम के बाग में - मखमल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो। चार दिन तक पलक नहीं झँपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाय। फिर सात जर्मनों को अकेला मार कर न लौटे, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े - संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अंधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो..' नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते! क्यों? सूबेदार हजारासिंह ने मुस्कराकर कहा, 'लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाये नहीं चलते। बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा? 'सूबेदारजी, सच है, लहनासिंह बोला, 'पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धेँस गया। सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ से चम्बे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं। एक घावा हो जाय, तो गरमी आ जाय। उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल । वजीरा, तुम चार जने बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदल दे। यह कहते हुए सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे। वज़ीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गँदला पानी भर कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला, "मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!" इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए। लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में देकर कहा- 'अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा। के हां, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमा जमीन यहाँ माँग लूँगा और फलों बूटे लगाऊँगा। लाडी होरां को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलानेवाली फरंगी मेम.. चुप कर । यहाँ वालों को शरम नहीं। देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तम्बाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेगा नहीं। अच्छा, अब बोधासिंह कैसा है? अच्छा है। जैसे मैं जानता ही न होऊँ ! रात-भर तुम अपने कम्बल उसे उठ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न माँदे पड़ जाना । जाड़ा क्या है, मौत है, और 'निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते। मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खडु के किनारे मरूँगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी। (तीन) दो पहर रात गई है। अन्धेरा है सन्नाटा छाया हुआ है बोधासिंह खाली बिस्कुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कम्बल बिछा कर और लहनासिंह के दो कम्बल और एक बरकोट ओढ़ कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा। 'क्यों बोधा भाई, क्या है? पानी पिला दो। लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगा कर पूछा- कहो कैसे हो?' पानी पी कर बोधा बोला-कॅपी (कँपकँपी) छूट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दाँत बज रहे हैं। अच्छा, मेरी जरसी पहन लो!' और तुम? मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है। ना, मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिए हां, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है आज सवेरे ही आई है। विलायत से बुन-बुनकर भेज रही हैं मेमें, गुरु उनका भला करें। यों कह कर लहना अपना कोट उतार कर जरसी उतारने लगा। सच कहते हो? और नहीं झूठ?' यों कह कर नाहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहनकर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी। आधा घण्टा बीता। इतने में खाई के मुँह से आवाज आई, 'सूबेदार हजारासिंह! कौन, लपटन साहब? हुक्म हुजूर' कह कर सूबेदार तन कर फौजी सलाम करके सामने हुआ। "देखो, इसी समय धावा करना होगा मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से जियादह जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काट कर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहाँ मोड़ है वहाँ पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़ कर सब को साथ ले उनसे जा मिलो। खन्दक छीन कर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहाँ रहेगा" जो हुकुम। चुपचाप सब तैयार हो गए। बोधा भी कम्बल उतार कर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझ कर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें. इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना नहीं चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेर कर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ा कर कहा- लो तुम भी पियो। आँख मारते-करते लहनासिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपा कर बोला- लाओ साहब।' हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहाँ उड़ गए और उनकी जगह कैदियों के से कटे बाल कहाँ से आ गए? शायद साहब शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है?लहनासिंह ने जाँचना चाहा- लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे। क्यों साहब, हम लोग हिन्दुस्तान कब जाएँगे?' लड़ाई खत्म होने पर। क्यों, क्या यह देश पसन्द नही? नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ?याद है, पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधारी जिले में शिकार करने गए थे - हाँ- हां - वहीं जब आप खोते पर सवार थे और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था?बेशक, पाजी कहीं का - सामने से वह नीलगाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थीं। और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुढे से निकली। ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा है। क्यों साहब, शिमले से तैयार होकर उस नील गाय का सिर आ गया था न! आपने कहा था कि रेजिमेंट की मेस में लगाएँगे। हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया - ऐसे बड़े-बड़े सींग! दो-दो फुट के तो होंगे? हाँ, लहनासिंह, दो फुट चार इंच के थे तुमने सिगरेट नहीं पिया? पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ- कह कर लहनासिंह खन्दक में घुसा। अब उसे सन्देह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए। अंधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया। कौन?वज़ीरासिंह? हो, क्यों लहना?क्या कयामत आ गई?जरा तो आँख लगने दी होती? होश में आओ। कयामत आई और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है। क्या? लपटन साहब या तो मारे गए हैं या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहन कर यह कोई जर्मन आया है, सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा है और बातें की हैं।... साफ उर्दू बोलता है, पर किताबी और मुझे पीने को सिगरेट दिया है। उर्दू 'तो अब!' 'अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार होरां, कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे। सूबेदार से कहो एकदम लौट आवें। खन्दक की बात झूठ है। चले जाओ, खन्दक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो, हुकुम तो यह है कि यहीं ऐसी- तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम.. जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सब से बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ। पर यहाँ तो तुम आठ ही हो। 'आठ नहीं, दस लाख । एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ। लौट कर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर के तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खन्दक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार-सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जला कर गुत्थी पर रखने.. बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठा कर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तान कर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आह! मीन गौट कहते हुए चित्त हो गए। लहनासिंह ने तीनों गोले बीन कर खन्दक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया। साहब की मूर्छा हटी। लहनासिंह हँस कर बोला- 'क्यों लपटन साहब?मिजाज कैसा है?आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नील गायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मंदिरों में जल चढ़ाते हैं। और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आए?हमारे लपटन साहब तो बिना 'डेम के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे। लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए. दोनों हाथ जेवों में डाले। लहनासिंह कहता गया, चालाक तो बड़े हो पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए, एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड के नीचे मंजा विछा कर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनीवाले बड़े पंडित हैं वेद पढ़-पढ़ कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते । हिन्दुस्तान में आ जाएँगे तो गोहत्या बन्द कर देंगे मंडी, के बनियों को बहकाता कि डाकखाने से रुपया निकाल लो। सरकार का राज्य जानेवाला है। डाक-याबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्ला जी की दाढ़ी मूंड दी थी और गाँव से बाहर निकाल कर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रक्खा तो- साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी इधर लहना की हैनरी मार्टिनी के दो फायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी। धड़ाका सुन कर सब दौड़े आए। बोधा चिल्लाया- क्या है? लहनासिंह ने उसे यह कह कर सुला दिया कि एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया औरों से सब हाल कह दिया। सब बन्दूकें लेकर तैयार हो गए। लहना ने साफा फाड़ कर घाव के दोनों तरफ पट्टियाँ कस कर बाँधी। घाव माँस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बन्द हो गया। इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिक्खों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका । पर यहाँ थे आठ (लहनासिंह तक-तक कर मार रहा था - वह खड़ा था, और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़ कर जर्मन आगे घुसे आते थे। थोड़े मिनटों में वे- अचानक आवाज आई "वाह गुरु जी दी फतह! वाह गुरु जी दा खालसा!!" और धड़ाधड़ बन्दूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया। एक किलकारी और - 'अकाल सिक्खों दी फौज आई!' वाह गुरु जी दी फतह! वाह गुरु जी दा खालसा!! सत श्री अकालपुरुष!!!" और लड़ाई खत्म हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आरपार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खन्दक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कस कर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव - भारी घाव लगा है। लड़ाई के समय चाँद निकल आया था, ऐसा चाँद, जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियों का दिया हुआ क्षयी' नाम सार्थक होता है और हवा ऐसी चल रही थी जैसी बाणभट्ट की भाषा में दन्तवीणोपदेशाचार्य कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर वे उसकी तुरत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते। इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिने ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफोन कर दिया था। वहीं से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घण्टे के अन्दर-अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नजदीक था सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएँगे, इसलिए मामूली पट्टी बोधकर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और दूसरी में लाशें रखी गई सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बैंधवानी चाही पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायेगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़ कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा- तुम्हें बोधा की कसम है और सूबेदारनी जी की सौगन्ध है, जो इस गाड़ी में न चले जाओ। और तुम? मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुरदों के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ?वजीरासिंह मेरे पास तो है ही। अच्छा, पर बोधा गाड़ी पर लेट गया?भला! आप भी चढ़ जाओ। सुनिये तो, सूबेदारनी होरों को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया। गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़ कर कहा, 'तैने मेरे और बोघा के प्राण बचाये हैं। लिखना कैसा?साथ ही घर चलेंगे अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना उसने क्या कहा था? अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना, और कह भी देना। गाड़ी के जाते लहना लेट गया। वजीरा पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है। (पाँच) मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है जन्म-भर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं। समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है। X X X लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, 'तेरी कुड़माई हो गई? तब धत्' कह कर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा, हाँ, कल हो गई, देखते नहीं यह रेशम के फूलोंवाला सालू? सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ? 'वजीरासिंह, पानी पिला दे। x पच्चीस वर्ष बीत गए। अब लहनासिंह नं 7ा राइफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न-मालूम वह कभी मिली थी, या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकद्दमें की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेंट के अफसर की चिट्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है, फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा। जब चलने लगे, तब सूबेदार बेड़े में से निकल कर आया। बोला- 'लहना, सूबेदारनी तुमको जानती हैं। बुलाती है। जा मिल आ। लहनासिंह भीतर पहुँचा । सूबेदारनी मुझे जानती हैं?कब से?रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं । दरवाजे पर जा कर 'मत्था टेकना कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप। मुझे पहचाना? नहीं। तेरी कुड़माई हो गई ?यत् -कल हो गई-देखते नहीं रेशमी बूटोंवाला सालू -अमृतसर में_r भावों की टकराहट से मूर्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला। 'वजीरा, पानी पिला।- उसने कहा था।' x x स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है- मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमक-हलाली का मौका आया है, पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती?एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए. पर चले गए थे, और मुझे उठा कर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ। एक भी नहीं जिया। 'सूबेदारनी रोने लगी। अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन ताँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था । तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे, आप घोड़े की लातों में रोती-रोती सूबेदारनी ओवरी में चली गई। लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया। "वजीरासिंह, पानी पिला" - उसने कहा था । x X लहना का सिर अपनी गोदी में रखे वज़ीरासिंह बैठा है। जब माँगता है, तब पानी पिला देता है। आध घण्टे तक लहना चुप रहा, फिर बोला- कौन! कीरतसिंह?' वज़ीरा ने कुछ समझकर कहा- हाँ। 'भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले। वज़ीरा ने वैसे ही किया। हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस, अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठ कर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था. उसी महीने में मैंने इसे लगाया था। वज़ीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे। x x कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा फ्रान्स और बेलजियम- 68 वीं सूची- मैदान में घावों से मरा- नं 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह। (9)

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

3.4 धर्म और राजनीति (Religion & Politics)

34 धर्म और राजनीति (Religion & Politics) प्राचीन समय से "धर्म और राजनीति" अथवा "राजनीति

और धर्म" में गहरा संबंध रहा हैं। जब-जब धर्म व राजनीति का नकारात्मक संसर्ग हुआ हैं, तब-तब राजनीति ने धर्म का दुरूपयोग किया हैं। बट्ट्रेड रसेल और ई.एम. फोस्टर जैसे शान्तिवादी विद्वानों ने धर्म की इस बात के लिए आलोचना की है कि धर्म के नाम पर शुद्ध राजनीति करने से विश्व में हमेशा खून-खराबा हुआ है जो आज भी जारी है। आज भी सभी धर्मों में धर्मान्ध कट्टरपंथी मरने मारने को तैयार है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व में कई ऐसे शक्ति समूह व संवर्ग उत्पन्न हुए है। प्रारम्भ में धर्म, शासन के लिए सुव्यवस्था और सुनीति का संस्थापक बना लेकिन बाद में अनेक शासकों ने धर्म विशेष को अपना राजधर्म घोषित किया और अपने अनुयायिओं की संख्या बढ़ाने के लिए धर्म की आड़ में युद्ध किए। इस्लाम, इसाई, यहुदी और हिन्दु धर्म से पृथक् हुए कुछ मतों ने शक्ति की आड़ में अपनी मान्यता, अपने धर्म के विस्तार का कार्य किया । धर्म की आड़ में साम्राज्यों का विस्तार किया गया और अनेक देशों में परस्पर युद्ध हुए। विगत लगभग दो हजार वर्ष का इतिहास धर्म के नाम पर अनेक बार रक्त रंजित हुआ। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में धर्म आधारित युद्धों पर कुछ हद तक विराम अवश्य लगा किन्तु धार्मिक श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए धर्म की आड़ में





आतंकी गतिविधियों की बाढ़ आ गई है। आतंकवादियों ने दूसरे धर्मानुयायियों को अकारण शिकार बनाना आरम्भ कर दिया है। भारत इसका सबसे बड़ा शिकार है। राम मनोहर लोहिया के अनुसार "धर्म और राजनीति के

दायरे अलग-अलग हैं परन्तु दोनों की जड़े एक हैं। धर्म दीर्घकालीन राजनीति हैं, जबकि राजनीति अल्पकालीन धर्म हैं। धर्म का काम भलाई करना और उसकी स्तुति करना हैं, जबकि राजनीति का कार्य बुराई से लड़ना और बुराई की निन्दा करना हैं। समस्या तब उत्पन्न होती हैं जब राजनीति बुराई से लड़ने के स्थान पर केवल निन्दा करती हैं, तो वह कलही हो जाती हैं, इसलिये आवश्यक हैं कि धर्म और राजनीति के मूल तत्वों को समझा जाये। धर्म और राजनीति का विवेकपूर्ण मिलन मानवीय कल्याण में साधक होता हैं, जबकि इन दोनों का अविवेकपूर्ण मिलन दोनों को भ्रष्ट कर देता हैं, जो मानवता के लिए अनिष्टकारी होता हैं। इस अविवेकपूर्ण मिलन से साम्प्रदायिक कट्टरता उत्पन्न होती हैं। धर्म और राजनीति को पृथक् करने का सबसे बड़ा उद्देश्य यही हैं कि दोनों अपने-अपने मर्यादित क्षेत्र में सक्रिय रहें किन्तु दोनों एक दूसरे का अपनी निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये दुरूपयोग न करें। वस्तुतः धर्म और राजनीति में सदैव मर्यादित सम्पर्क बना रहना चाहिए ताकि दोनों एक दूसरे का परस्पर सकारात्मक सहयोग कर सकें। नीतिगत धर्म व धर्मप्रद राजनीति का अनुगमन विश्व शान्ति की स्थापना के लिये अपरिहार्य है। राजनीति का धर्म को और धर्म का राजनीति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करना मानवता के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है। इससे धार्मिक प्रतिक्रियावाद, कट्टरपन, साम्प्रदायिकता व गुलामी की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, जो स्वतन्त्रता व समानता जैसे महत्त्वपूर्ण मूल्यों को प्रभावित करती है। आज विश्व में अधिकांश लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्त को अपनाया गया है।






स्वामी विवेकानन्द के अनुसार "आडम्बर आच्छादित व हठधर्मितापूर्ण धर्म मनुष्य को विभाजित करता है, जबकि अनुभव से विकसित धर्म मनुष्य को परस्पर जोड़ने का कार्य करता है।" उन्होंने यह भी कहा है कि "जो दूसरों के लिये जीते हैं, वे ही सच में जीते हैं, शेष तो जीते हुए भी मरे जैसे है। उनके अनुसार व्यक्ति और समाज में परस्पर अनुकूलता एकात्मकता का भाव व मानवतावादी दृष्टिकोण धर्म के अनुशीलन से ही संभव है।

class 12 rajnitik vigyan political scienceइकाई 1 लेसन 3 लेसन 3

महत्वपूर्ण बिन्दु

धर्म मनुष्य में पहले से व्याप्त देवत्व व आध्यात्मिकता का विस्तार मात्र हैं।

विश्व की अधिकांश राजनीतिक व्यवस्थाओं में धर्मनिरपेक्षता को नीति के रूप में स्वीकार करने पर बल दिया जाता है।

विश्व के विभिन्न भागों में काल, स्थान व संस्कृति के अनुरूप कई धर्मों का उद्भव व विकास हुआ। • समय, स्थान और सांस्कृतिक व आध्यात्मिक परिस्थितियों के परिवर्तन से धर्मों में भी परिवर्तन आये।

सभी धर्मों ने मूलतः एकता के बुनियादी तथ्यों एवं मूल्यों

की बात की है। वर्तमान समस्या अलग-अलग धर्मों और मतों में एकता स्थापित करने की चेष्टा की हैं।

धर्म आत्मा के उन्नयन के लिए आध्यात्मिक पक्ष पर बल देता है। ० धर्म, जीवन को धर्म निरपेक्षता की ओर अग्रेषित करें। भारतीय संस्कृति और दर्शन में धर्म सदैव एक महत्त्वपूर्ण

संकल्पना रही हैं।

धर्म का सबसे पहले आगाज पूर्वी संस्कृतियों में हुआ। . भारत में धर्म को कर्त्तव्य, अहिंसा, न्याय सदाचरण

तथा सद्गुण के अर्थ में मान्यता प्राप्त हैं। ० धर्म उन्नति और कल्याण में साधक होता है।

अंग्रेजी में धर्म का समानान्तर शब्द Religion (रिलिजन) है, जिसका अर्थ है - आस्था, विश्वास अथवा अपनी मान्यता।

धर्म सर्वत्र पवित्र माना गया है, लेकिन धार्मिक पवित्रता सापेक्षवादी है।

धार्मिक मतों व पंथों ने अपनी व्यक्तिगत श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए एक-दूसरे से लड़ना-भिड़ना शुरु कर दिया है। इस तरह की आपसी विरोध,कलह की प्रवृत्ति ने धार्मिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज के परिप्रेक्ष्य में मानवता के धर्म को सबसे श्रेष्ठ

धर्म समझा जाये। एक धर्म तभी उपयोगी है जब वह अन्य सादृश धर्मों से एकरूपता स्थापित करता ।

सभी धर्मों के समान मूल्यों से ही विश्व में ईश्वरीय राज्य

की स्थापना सम्भव है।

जब-जब धर्म व राजनीति का नकारात्मक संसर्ग हुआ हैं, तब-तब राजनीति ने धर्म का दुरूपयोग किया हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्म निरपेक्षता का अर्थ पाश्चात्य

धर्म से भिन्न है। भारतीय संकल्पना में धर्म केवल लौकिक धर्म नहीं हैं। • धर्म और अहिंसा का अटूट सम्बन्ध हैं।

• भारत में धर्म का संबंध साधनापक्ष एवं आचारपक्ष से हैं जिसका लक्ष्य आत्मा का उत्थान हैं।

० याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ लक्षण गिनाये है। राष्ट्र धर्म सर्वोपरि है ण

• ईसाई धर्म एकेश्वरवादी धर्म है

ईसाई राजनीतिक विचारधारा में धर्म और राजनीति दोनों की समानान्तर सत्ता को स्वीकार किया गया है।

• इस्लाम दुनिया के नवीनतम धर्मों में से एक है।

• इस्लाम धर्म के आध्यात्मिक और लौकिक, अलौकिक और व्यावहारिक, धार्मिक और धर्म निरपेक्ष में भेद नहीं करता

इस्लाम धर्म और राजनीति के मध्य कोई भेद नहीं करता बल्कि दोनों को एक दूसरे से गुंथा हुआ मानता हैं।

34 धर्म और राजनीति (Religion & Politics)

34 धर्म और राजनीति (Religion & Politics) प्राचीन समय से "धर्म और राजनीति" अथवा "राजनीति

और धर्म" में गहरा संबंध रहा हैं। जब-जब धर्म व राजनीति का नकारात्मक संसर्ग हुआ हैं, तब-तब राजनीति ने धर्म का दुरूपयोग किया हैं। बट्ट्रेड रसेल और ई. एम. फोस्टर जैसे शान्तिवादी विद्वानों ने धर्म की इस बात के लिए आलोचना की है कि धर्म के नाम पर शुद्ध राजनीति करने से विश्व में हमेशा खून-खराबा हुआ है जो आज भी जारी है। आज भी सभी धर्मों में धर्मान्ध कट्टरपंथी मरने मारने को तैयार है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व में कई ऐसे शक्ति समूह व संवर्ग उत्पन्न हुए है। प्रारम्भ में धर्म, शासन के लिए सुव्यवस्था और सुनीति का संस्थापक बना लेकिन बाद में अनेक शासकों ने धर्म विशेष को अपना राजधर्म घोषित किया और अपने अनुयायिओं की संख्या बढ़ाने के लिए धर्म की आड़ में युद्ध किए। इस्लाम, इसाई, यहुदी और हिन्दु धर्म से पृथक् हुए कुछ मतों ने शक्ति की आड़ में अपनी मान्यता, अपने धर्म के विस्तार का कार्य किया। धर्म की आड़ में साम्राज्यों का विस्तार किया गया और अनेक देशों में परस्पर युद्ध हुए। विगत लगभग दो हजार वर्ष का इतिहास धर्म के नाम पर अनेक बार रक्त रंजित हुआ। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में धर्म आधारित युद्धों पर कुछ हद तक विराम अवश्य लगा किन्तु धार्मिक श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए धर्म की आड़ मेंआतंकी गतिविधियों की बाढ़ आ गई है। आतंकवादियों ने दूसरे धर्मानुयायियों को अकारण शिकार बनाना आरम्भ कर दिया है। भारत इसका सबसे बड़ा शिकार है।

राम मनोहर लोहिया के अनुसार "धर्म और राजनीति के दायरे अलग-अलग हैं परन्तु दोनों की जड़े एक हैं। धर्म दीर्घकालीन राजनीति हैं, जबकि राजनीति अल्पकालीन धर्म हैं। धर्म का काम भलाई करना और उसकी स्तुति करना हैं, जबकि राजनीति का कार्य बुराई से लड़ना और बुराई की निन्दा करना हैं। समस्या तब उत्पन्न होती हैं जब राजनीति बुराई से लड़ने के स्थान पर केवल निन्दा करती हैं, तो वह कलही हो जाती हैं, इसलिये आवश्यक हैं कि धर्म और राजनीति के मूल तत्वों को समझा जाये । धर्म और राजनीति का विवेकपूर्ण मिलन मानवीय कल्याण में साधक होता हैं, जबकि इन दोनों का अविवेकपूर्ण मिलन दोनों को भ्रष्ट कर देता हैं, जो मानवता के लिए अनिष्टकारी होता हैं। इस अविवेकपूर्ण मिलन से साम्प्रदायिक कट्टरता उत्पन्न होती हैं। धर्म और राजनीति को पृथक् करने का सबसे बड़ा उद्देश्य यही हैं कि दोनों अपने-अपने मर्यादित क्षेत्र में सक्रिय रहें किन्तु दोनों एक दूसरे का अपनी निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये दुरूपयोग न करें। वस्तुतः धर्म और राजनीति में सदैव मर्यादित सम्पर्क बना रहना चाहिए ताकि दोनों एक दूसरे का परस्पर सकारात्मक सहयोग कर सकें। नीतिगत धर्म व धर्मप्रद राजनीति का अनुगमन विश्व शान्ति की स्थापना के लिये अपरिहार्य है। राजनीति का धर्म को और धर्म का राजनीति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करना मानवता के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है। इससे धार्मिक प्रतिक्रियावाद, कट्टरपन, साम्प्रदायिकता व गुलामी की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, जो स्वतन्त्रता व समानता जैसे महत्त्वपूर्ण मूल्यों को प्रभावित करती है। आज विश्व में अधिकांश लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार "आडम्बर आच्छादित व हठधर्मितापूर्ण धर्म मनुष्य को विभाजित करता है, जबकि अनुभव से विकसित धर्म मनुष्य को परस्पर जोड़ने का कार्य करता है।" उन्होंने यह भी कहा है कि "जो दूसरों के लिये जीते हैं, वे ही सच में जीते हैं, शेष तो जीते हुए भी मरे जैसे है।" उनके अनुसार व्यक्ति और समाज में परस्पर अनुकूलता एकात्मकता का भाव व मानवतावादी दृष्टिकोण धर्म के अनुशीलन से ही संभव है।

कक्षा 12वीं की राजनीतिक विज्ञान इकाई 1 प्रमुख अवधारणाएं पाठ 1 न्याय जस्टिस महत्वपूर्ण बिंदु

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में धर्म' का प्रयोग न्याय' के सादृश हुआ है।

प्लेटो ने न्याय को मनुष्य का आत्मीय गुण माना है। प्लेटो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना ही न्याय है।

अरस्तू के अनुसार न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। परम्परागत न्याय का सरोकार व्यक्ति के चरित्र से है,

वहीं आधुनिक दृष्टिकोण का सरोकार सामाजिक न्याय

से है।

प्लेटो और अरस्तू परम्परागत न्याय के प्रमुख विचारक हैं।

. प्लेटो ने न्याय सिद्धान्त की व्याख्या अपनी रचना रिपब्लिक' में की हैं।

प्लेटो न्याय के दो रूप मानता है - 1.व्यक्तिगत न्याय

2.सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय

अरस्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किए - 1.वितरणात्मक

. 2.सुधारात्मक न्याय मध्यकाल में संत ऑगस्टाइन ने ईश्वरीय राज्य में न्याय को अपरिहार्य तत्व माना है।

. थॉमस एक्विनास समानता को न्याय का मौलिक तत्व मानते हैं।

जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सम्बन्धी विचार अपनी पुस्तक 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस (ATheory of Justice) में व्यक्त किए है।

जॉन रॉल्स ने अज्ञानता के पर्दे (Veil of Ignorance) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। न्याय की धारणा के विविध रूप

1.नैतिक न्याय 2.कानूनी न्याय

3.राजनीतिक न्याय

4.सामाजिक न्याय

5.आर्थिक न्याय

डेविड ह्यूम ने नियमों की अनुपालना को ही न्याय माना

है।

जेरेमी बेंथम ने अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को ही न्याय का मूल मंत्र माना है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता

का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व माना है।

1.4 आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा ( The Concept of Justice in Modern Period)

1.4 आधुनिक काल में न्याय सम्बन्धी धारणा ( The Concept of Justice in Modern Period)

आधुनिक युग में डेविड ह्यूम (1711-76) ने यह मत व्यक्त किया कि न्याय का अर्थ नियमों की पालना मात्र है क्योंकि अनुभव से यह सिद्ध हो चुका है कि ये नियम सर्व- हित' का आधार है। अतः ' सर्व- हित ' या 'सार्वजनिक उपयोगिता को न्याय का एकमात्र स्त्रोत होना चाहिए। मनुष्य की प्रकृति, तर्कबुद्धि या अनुबन्ध में इन नियमों का स्त्रोत ढूंढ़ने से कोई लाभ नहीं फिर उपयोगितावाद के प्रवर्तक जैरेमी बेंथम ने कहा कि प्राकृतिक कानून' सरीखी शब्दावली यथार्थ मूल्यों को धुंधला कर देती है। सार्वजनिक वस्तुओं, सेवाओं, इत्यादि का वितरण उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए जिसका सूत्र अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व मानते हुए यह तर्क दिया है कि मनुष्य अपने लिए सुरक्षा की कामना करते हैं, इसलिए वे ऐसे नैतिक नियम स्वीकार कर लेते हैं जिनमें दूसरे भी वैसी ही सुरक्षा अनुभव कर सकें। अतः उपयोगिता ही न्याय का मूल मन्त्र है।

वर्तमान में प्राकृतिक कानून या कोरी उपयोगिता पर आधारित न्याय की संकल्पना में विश्वास नहीं किया जाता। वस्तुतः प्राकृतिक कानून के नियमों, प्राकृतिक अधिकारों या सार्वजनिक उपयोगिता के स्वरूप के बारे में कोई सर्वसम्मत मान्यता विकसित नहीं हो पाई है। आज न्याय के सम्बन्ध में केवल ऐसी संकल्पना को स्वीकार कर सकते हैं जिसका निर्माण जीवन के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक यथार्थ को सामने रखकर किया गया हो।

1.3 मध्यकाल में न्याय सम्बन्धी विचार (The Concept of Justice in Medieval Period)संत ऑगस्टाइन

संत ऑगस्टाइन अपने 'ईश्वरीय राज्य ' के सिद्धान्त को प्रतिपादित करने में न्याय को इसका महत्त्वपूर्ण व अपरिहार्य तत्व माना है। वह अपनी रचना " द सिटी ऑफ गॉड " में लिखते हैं कि " जिन राज्यों में न्याय विद्यमान नहीं हैं, वे केवल चोर उच्चक्कों की खरीद फरोख्त हैं।

"Set justice aside them and what are kìngdoms but fair thievish purchases."

ऑगस्टाइन परिवार, लौकिक राज्य और ईश्वरीय राज्य के सन्दर्भ में न्याय की विवेचना करते हैं। व्यक्ति द्वारा ईश्वरीय राज्य के प्रति कर्त्तव्य पालन को ही वह न्याय मानते हैं।

मध्यकाल में ही थॉमस एक्विनास कानून व न्याय को परस्पर सम्बन्धित मानते हुए न्याय की निम्नलिखित परिभाषाव्यक्त करते हैं

"न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन व्यतीत करने तथा उन कर्त्तव्यों का पालन करने में निहित हैं, जिनकी व्यवस्था मांग करती है।"

थॉमस एक्विनास समानता को न्याय का मौलिक तत्व

मानते हैं।

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के अनुसार, न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे मे एक -जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है। इस मानकीय धारणा के रूप में न्याय समग्र सात्विकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयोग-क्षेत्र के आधार पर अस्स्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किये -1.वितरणात्मक न्याय(Distributive Justice)-अस्स्तु वितरणात्मक न्याय के अन्तर्गत शक्ति एवं संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता व योगदान के अनुरूप करने की बात कहता है। वह आनुपातिक समानता का पक्षधर है। समानता की इस अवधारणा के अनुसार लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के अनुपात में ही होना चाहिए।सुधारात्मक न्याय (Corrective Justice) -अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम पर बल देता हो। सुधारात्मक न्याय में राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता की रक्षा करें। इस प्रकार वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य द्वारा की गयी व्यवस्था को सुधारात्मक न्याय की संज्ञा देता है।

प्लेटो के शिष्य अरस्तू के अनुसार, न्याय का सरोकार मानवीय सम्बन्धों के नियमन से है। अरस्तू का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे मे एक -जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है। इस मानकीय धारणा के रूप में न्याय समग्र सात्विकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयोग-क्षेत्र के आधार पर अस्स्तू ने न्याय के दो रूप प्रस्तुत किये -











     



1.

वितरणात्मक न्याय

(Distributive Justice)-

अस्स्तु वितरणात्मक न्याय के अन्तर्गत शक्ति एवं संरक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता व योगदान के अनुरूप करने की बात कहता है। वह आनुपातिक समानता का पक्षधर है। समानता की इस अवधारणा के अनुसार लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के अनुपात में ही होना चाहिए।






सुधारात्मक न्याय (Corrective Justice) -



अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम पर बल देता हो। सुधारात्मक न्याय में राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति, सम्मान और स्वतन्त्रता की रक्षा करें। इस प्रकार वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिये राज्य द्वारा की गयी व्यवस्था को सुधारात्मक न्याय की संज्ञा देता है।





















समाप्त


1.1 प्लेटो का न्याय सम्बन्धी विचार (Plato's Concept of Justice)

प्लेटो का न्याय से तात्पर्य है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना। प्लेटो ने न्याय को एक मौलिक सदगुण (Cardinal) मानते कहा है कि हम सभी अपेक्षित हितों को साधने में सहायक बनें। प्लेटो अपनी पुस्तक रिपब्लिक में न्याय को समझाने के लिए पुस्तक II, III और IV में काफी रोचक विश्लेषण करता है। वह सबसे पहले सामाजिक व राजनीतिक न्याय की धारणा को व्यक्तिगत न्याय से पृथक करने की चेष्टा करता है।




प्लेटो न्याय के दो रूप मानता है जिनमें एक व्यक्तिगत और दूसरा सामाजिक या राज्य से सम्बन्धित न्याय प्लेटो की मान्यता थी कि मानवीय आत्मा में तीन तत्व पाये जाते हैं - बुद्धि, शौर्य और तृष्णा। इन तीनों तत्वों की मात्रा के अनुसार ही वह राज्य और समाज में तीन वर्ग स्थापित करता है। पहला शासक वर्ग, जिसमें बुद्धि का अंश सर्वाधिक पाया जाता है। दूसरा सैनिक वर्ग या रक्षक वर्ग जिसमें शौर्य एवं साहस तत्व की अपेक्षाकृत अधिक मात्रा पायी जाती है। तीसरा उत्पादक या सहायक वर्ग जिसमें इन्द्रिय तृष्णा व इच्छा तत्व की अधिकता पायी जाती है। सभी मनुष्यों में तीनों त्व न्यूनाधिक मात्रा में पाये जाते हैं। परन्तु जिस तत्व की मात्रा प्रधान रूप से पायी जाती है, वही उसके सद्गुणों को प्रवृत करता है। प्लेटो न्याय को आत्मा का मानवीय सद्गुण मानता है। प्लेटो के अनुसार आत्मा में निहित न्याय का विचार वास्तव में राज्य में निहित न्याय का ही सादृश्य है। जिस प्रकार व्यक्ति की आत्मा में विद्यमान न्याय व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को परस्पर संतुलित करता है, उसी भाँति राज्य में व्याप्त न्याय, समाज के तीनों वर्गों में सामंजस्य स्थापित करता है। प्रत्येक व्यक्ति को वही कार्य करना चाहिए जिसके लिए वह प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक समर्थ व उपयुक्त है। इसी तरह राज्य के तीनों वर्गों को भी अपने-अपने निर्दिष्ट कार्यक्षेत्र की परिधि में ही कार्य करना चाहिए। दूसरों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप को प्लेटो व्यक्ति व राज्य दोनों के लिए अनिष्टकारी मानता है। इन तत्वों की उपस्थिति के अनुपात में ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता व क्षमता के अनुरूप आचरण करना चाहिए और दूसरों के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस प्रवृत्ति को प्लेटो न्याय की संज्ञा देता है। प्लेटो ने अपने न्याय के सिद्धान्त को एक नैतिक सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किया न कि कानूनी सिद्धान्त के रूप में। उनका न्याय सिद्धान्त कार्य विशेषीकरण के सिद्धान्त पर आधारित है जो प्रत्येक व्यक्ति को समाज के प्रति विशेष योगदान हेतु प्रेरित करता है।








न्याय की अवधारणा (Concept of Justice)

 न्याय की अवधारणा (Concept of Justice)


न्याय की संकल्पना प्राचीन काल से ही राजनीतिक चिंतन का महत्त्वपूर्ण विषय रही है। पश्चिमी परम्परा के अन्तर्गत न्याय के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए मुख्यतः न्यायपरायण व्यक्ति ' अर्थात् सद्चरित्र मनुष्य के गुणों पर विचार किया जाता था। इसमें उन सद्गुणों की तलाश की जाती थी जो व्यक्ति को न्याय की ओर प्रवृत्त करते हैं। भारतीय परम्परा में भी मनुष्य के 'धर्म ' को प्रमुखता दी गई है। इन दोनों ही मान्यताओं में मनुष्य के कर्तव्य पालन पर बल दिया गया है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना एवं दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है। यद्यपि आधुनिक चिंतन में न्याय की परिभाषा में परिवर्तन आया है।


न्याय प्रत्यय ' की व्याख्या अलग-अलग विचारकों ने अपने-अपने ढंग से करने का प्रयत्न किया है। पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय के अर्थ को स्पष्ट करने का सर्वप्रथम प्रयास यूनानी दार्शनिक एवं राजनीतिक विचारक प्लेटो ने किया था। प्लेटो ने अपने दर्शन में ' न्याय प्रत्यय को मनुष्य का आत्मीय गुण माना है। उनके अनुसार यह वह सदगुण है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य सबकी भलाई में अपना भला ढूंढता है। प्लेटो से लेकर अब तक सभी चिंतकों ने न्याय को महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं नैतिक प्रत्यय माना है। एक तरफ न्याय, व्यक्ति का निजी चारित्रिक सद्गुण है. वहीं दूसरी तरफ न्याय राजनीतिक समाज का वांछनीय गुण माना गया है। न्याय, नैतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक निर्णयन को प्रभावित करने वाला तत्व है। मध्यकालीन ईसाई विचारकों ऑगस्टाइन व एक्वीनास ने न्याय की अपने ढंग से व्याख्या की है। आधुनिक चिंतन के प्रारम्भिक चरण में हॉब्स, ह्यूम, कार्ल मार्क्स, काण्ट और मिल ने अपने चिंतन में न्याय को प्रमुख स्थान प्रदान किया है। समकालीन विचारकों में जॉन रॉल्स ने न्याय को नवीन स्वरूप में प्रस्तुत किया है।

नीरज चोपड़ा ने गर्लफ्रेंड और शादी के सवाल पर दिया ये जवाब

नीरज चोपड़ा ने गर्लफ्रेंड और शादी के सवाल पर दिया ये जवाबनीरज चोपड़ा की उम्र 23 साल है और फिलहाल उन्हें सबसे एलिजबल बैचल...